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Brahmanand Rajput

15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर हिन्दुस्तान में जगह -जगह हवा में लहराता झंडा हमें स्वतंत्र भारत का नागरिक होने का अहसास कराता है। इस साल 75वां स्वतंत्रता दिवस होने की वजह से इस दिन की महत्वता और बढ जाती है। आजादी से लेकर आज तक भारत देश ने कई उतार-चढाव देखे है और हर प्रकार की परिस्थिति में अपने गौरव को बढाया है व विश्व पटल पर अपनी अलग पहचान बनाई है। स्वतंत्रता दिवस हमारा राष्ट्रीय पर्व है, इसी दिन हमारा हिन्दुस्तान आज से 74 साल पहले 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से स्वतंत्र हुआ था।

इसी दिन हमारे वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानिओं ने हमें अंग्रेजों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। हमें आजादी दिलाने के लिए न जाने कितने वीर वीरांगनाओं ने अंग्रेजों की अमानवीय यातनाओं व अत्याचारों का सामना किया और देश की आजादी के लिए अपनी आहुतियां दी। यह दिन ऐसे ही वीर-वीरांगनाओं को याद करने का दिन है। इस दिन का भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए एक विशेष महत्व है, इस दिन हर भारतवासी अपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को याद करता है, जिनके खून पसीने और संघर्ष से हमें आजादी नसीब हुई।

स्वतंत्रता के मायने हर नागरिक के लिए अलग-अलग होते हैं, कोई व्यक्ति स्वतंत्रता को अपने लिए खुली छूट मानता है, जिसमे वो अपनी मर्जी का कुछ भी कर सके, चाहे वो गलत हो या सही हो। लेकिन स्वतंत्रता सिर्फ अच्छी चीजों के लिए होती है। बुरी चीजों के लिए स्वतंत्रता अभिशाप बन जाती है।  इसलिए स्वतंत्रता के मायने तभी हैं जब स्वतंत्रता में मर्यादा, चरित्र और समर्पण का भाव हो। अगर स्वतंत्रता में मर्यादा, चरित्र और समर्पण ही नहीं है तो यह आजादी नहीं बल्कि एक प्रकार का छुट्टापन होता है। जिसपर कोई भी लगाम नहीं होती। यही छुट्टापन देश और समाज में बलात्कार, छेड़खानी, हत्या और मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं के अंजाम के लिए जिम्मेदार होता है।

indian flagस्वतंत्रता दिवस के दिन देश के युवा पतंगें उड़ा कर आजादी का जश्न मनाते हैं। हवा में लहराती पतंगें संदेश देती हैं कि हम आजाद देश के निवासी हैं। पर क्या तिरंगा फहराकर या पतंग उड़ाकर आजादी का अहसास हो जाता है? क्या भारत में हर किसी को आजादी से जीने का हक मिल पाया है? हमें आजादी मिली, उसका हमने क्या सदुपयोग किया। लोग पेड़ों को काट रहे हैं। बालिका भ्रूण की हत्या हो रही है। सड़कों पर महिलाओं पर अत्याचार होते हैं। अकेले रह रहे बुजुर्गों की हत्या कर दी जाती है। शराब पीकर लोग देश में सड़क हादसों को अंजाम देते हैं, और दूसरे बेगुनाह लोगों को मार देते हैं। ये कैसी आजादी है, जहां एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के अधिकारों का हनन कर रहा है।

बेशक भारत को स्वतंत्र हुए 74 साल हो गए हों, लेकिन आज भी हमारे आजाद भारत देश में बाल अधिकारों का हनन हो रहा है।  छोटे-छोटे बच्चे स्कूल जाने की उम्र में काम करते दिख जाते हैं। आज बाल मजदूरी समाज पर कलंक है। इसके खात्मे के लिए सरकारों और समाज को मिलकर काम करना होगा। साथ ही साथ बाल मजदूरी पर पूर्णतया रोक लगानी चाहिए। बच्चों के उत्थान और उनके अधिकारों के लिए अनेक योजनाओं का प्रारंभ किया जाना चाहिए। जिससे बच्चों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव दिखे और शिक्षा का अधिकार भी सभी बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। गरीबी दूर करने वाले सभी व्यवहारिक उपाय उपयोग में लाए जाने चाहिए।

बालश्रम की समस्या का समाधान तभी होगा जब हर बच्चे के पास उसका अधिकार पहुँच जाएगा। इसके लिए जो बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हैं, उनके अधिकार उनको दिलाने के लिये समाज और देश को सामूहिक प्रयास करने होंगे। आज देश के प्रत्येक नागरिक को बाल मजदूरी का उन्मूलन करने की जरुरत है। देश  के किसी भी हिस्से में कोई भी बच्चा बाल श्रमिक दिखे, तो देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह बाल मजदूरी का विरोध करे और इस दिशा में उचित कार्यवाही करें साथ ही साथ उनके अधिकार दिलाने के लिये प्रयास करें। देश का हर बच्चा कन्हैया का स्वरुप है, इसलिए कन्हैया के प्रतिरूप से बालश्रम कराना पाप है। इस पाप का भगीदार न बनकर देश के हर नागरिक को देश के नन्हे-मुन्नों को शिक्षा का अधिकार दिलाना चाहिए जिससे कि हर बच्चा बड़ा होकर देश का नाम विश्व स्तर पर रोशन कर सके।

amrut mahotsavभारत देश में कानून बनाने का अधिकार केवल भारतीय लोकतंत्र के मंदिर भारतीय संसद को दिया गया है। जब भी भारत में कोई नया कानून बनता है तो वो संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से पास होकर राष्ट्रपति के पास जाता है। जब राष्ट्रपति उस कानून पर बिना आपत्ति किये हुए हस्ताक्षर करता है तो वो देश का कानून बन जाता है। लेकिन आज देश के लिए कानून बनाने वाली भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था भारतीय संसद की हालत दयनीय है। जो लोग संसद के दोनों सदनों में प्रतिनिधि बनकर जाते हैं, वो लोग ही आज संसद को बंधक बनाये हुए हैं और उनमें से अधिकतर लोग लोकतन्त्र के मन्दिर भारतीय संसद की मर्यादा को तार-तार करते हैं व विश्व समुदाय के सामने देश के गौरव को कलंकित करने का काम करते है।

जब भी संसद सत्र चालू होता है तो संसद सदस्यों द्वारा चर्चा करने की बजाय हंगामा किया जाता है और देश की जनता के पैसों पर हर तरह की सुविधा पाने वाले संसद सदस्य देश के भले के लिए काम करने की जगह संसद को कुश्ती का अखाडा बना देते हैं, जिसमें पहलवानी के दांवपेचों की जगह आरोप प्रत्यारोप और अभद्र भाषा के दांवपेंच खेले जाते हैं। जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। आज जरुरत है कि देश के लिए कानून बनाने वाले संसद सदस्यों के लिए एक कठोर कानून बनना चाहिए।  जिसमें कड़े प्रावधान होने चाहिए, जिससे कि संसद सदस्य संसद में हंगामा खड़ा करने की जगह देश की भलाई के लिए अपना योगदान दें। आज हमारे जनप्रतिनिधि आम जनता के प्रतिनिधि न होकर सिर्फ और सिर्फ अपने और अपने लोगों के प्रतिनिधि बनकर खड़े होते हैं, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। एक स्वतंत्र गणतांत्रिक देश में जनप्रतिनिधियों से देश का कोई भी नागरिक ऐसी अपेक्षा नहीं करता है। हर जनप्रतिनिधि का फर्ज है कि वह अपने और अपने लोगों का प्रतिनिधि बनने की बजाय अपने क्षेत्र की सम्पूर्ण जनता के प्रतिनिधि बने और देश के सभी जनप्रतिनिधियों को न्यायप्रिय शासन करना चाहिए, जिसमें समाज के हर तबके के लिए स्थान हो तभी हमारी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रह पाएगी।

बेशक हम अपना 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हों लेकिन आज भी देश महिलाओं को पूर्णतः स्वतंत्रता नहीं है, आज भी देश में महिलाओं को बाहर अपनी मर्जी से काम करने से रोका जाता है। महिलाओं पर तमाम तरह की बंदिशे परिवार और समाज द्वारा थोपी जाती हैं जो कि संविधान द्वारा प्रदत्त महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों का हनन करती है। आज भी देश में महिलाओं के मौलिक अधिकार चाहे समानता का अधिकार हो, चाहे स्वतंत्रता का अधिकार हो, चाहे धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार हो, चाहे शिक्षा और संस्कृति सम्बन्धी अधिकार हो; समाज द्वारा नारियों के हर अधिकार को छीना जाता है या उस पर बंदिशे लगायी जाती हैं, जो कि एक स्वतंत्र देश के नवनिर्माण के लिए शुभ संकेत नहीं है। कोई भी देश तब अच्छे से निर्मित होता है जब उसके नागरिक चाहे महिला हो या पुरुष हो उस देश के कानून और संविधान को पूर्ण रूप से सम्मान करे और उसका कड़ाई से पालन करे।

आज बेशक भारत विश्व की उभरती हुई शक्ति है। लेकिन आज भी देश काफी पिछड़ा हुआ है। देश में आज भी कन्या जन्म को दुर्भाग्य माना जाता है, और आज भी भारत के रूढ़िवादी समाज में हजारों कन्याओं की भ्रूण में हत्या की जाती है। सड़कों पर महिलाओं पर अत्याचार होते हैं। सरेआम महिलाओं से छेड़छाड़ और बलात्कार के किस्से भारत देश में आम बात हैं। कई युवा (जिनमें भारी तादात में लड़कियां भी शामिल हैं) एक तरफ जहां हमारे देश का नाम ऊंचा कर रहे हैं। वहीं कई ऐसे युवा भी हैं जो देश को शर्मसार कर रहे हैं। दिनदहाड़े युवतियों का अपहरण, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न कर देश का सिर नीचा कर रहे हैं। हमें पैदा होते ही महिलाओं का सम्मान करना सिखाया जाता है पर आज भी विकृत मानसिकता के कई युवा घर से बाहर निकलते ही महिलाओं की इज्जत को तार-तार करने से नहीं चूकते। इस सबके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार शिक्षा का अभाव है।

शिक्षा का अधिकार हमें भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के रूप में अनुच्छेद 29-30 के अन्तर्गत दिया गया है। लेकिन आज भी देश के कई हिस्सों में नारी शिक्षा को सही नहीं माना जाता है। नारी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार के साथ भारतीय समाज को भी आगे आना होगा। तभी देश में अशिक्षा जैसे अँधेरे में शिक्षा रुपी दीपक को जलाकर उजाला किया जा सकता है। जब नारी को असल में शिक्षा का अधिकार मिलेगा तभी नारी इस देश में स्वतंत्र होगी। गीता में कहा गया है कि ‘‘सा विद्या या विमुक्तये।’’ अर्थात विद्या ही हमें समस्त बंधनों से मुक्ति दिलाती है, इसलिए राष्ट्र को आगे बढ़ाने के लिए बिना भेदभाव के सभी को शिक्षा का अधिकार दिया जाना चाहिए। आज लडकियां हर क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रही है, अगर लडकियों को उनकी प्रतिभा के अनुसार अवसर दियें जायें तो ये तादात और बढ सकती है। देश में जरुरत है लडकियों को अवसर देने की, जिससे कि वो अपने अवसर को सफलता में बदल सकें।

भारत देश बेशक एक स्वतंत्र गणराज्य सालों पहले बन गया हो। लेकिन इतने सालों बाद आज भी देश में धर्म, जाति और अमीरी गरीबी के आधार पर भेदभाव आम बात है। लोग आज भी जाति के आधार पर ऊंच-नीच की भावना रखते हैं। आज भी लोगों में सामंतवादी विचारधारा घर करी हुयी है और कुछ अमीर लोग आज भी समझते हैं कि अच्छे कपडे पहनना, अच्छे घर में रहना, अच्छी शिक्षा प्राप्त करना और आर्थिक विकास पर सिर्फ उनका ही जन्मसिध्द अधिकार है। इसके लिए जरूरत है कि देश में संविधान द्वारा प्रदत्त शिक्षा के अधिकार के जरिए लोगों में जागरूकता लायी जाये। जिससे कि देश में  धर्म, जाति, अमीरी-गरीबी और लिंग के आधार पर भेदभाव न हो सके।

इस वर्ष का स्वतंत्रता दिवस इस वजह से और अहम है कि इस साल टोक्यो ओलिंपिक-2020 में भारत ने अब तक के अपने ओलिंपिक इतिहास के सबसे ज्यादा पदक जीते है, जिसमें 1 स्वर्ण, 2 रजत और 4 कांस्य पदक जीते हैं।  इस ओलिंपिक गेम्स में एथलेटिक्स के इतिहास में पहला स्वर्ण पदक भाला फेंक प्रतियोगिता में देश के होनहार युवा 23 वर्षीय नीरज चोपड़ा ने जीता है और देश को विश्व पटल पर गौरवान्वित करने का काम किया है। इसके साथ ही कुश्ती में रवि कुमार दहिया ने रजत पदक जीतकर भारत का मान बढाया है। भारोत्तोलन प्रतियोगिता में देश की बेटी सेखोम मीराबाई चानू ने रजत पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। पी०वी० सिंधु ने बैडमिंटन में कांस्य पदक जीता है, पी० वी० सिंधु दो ओलिंपिक गेम्स (रियो 2016, टोक्यो-2020) में पदक जीतने वाली पहली महिला खिलाडी हैं।

भारत की बेटी लवलीन बोरगोहेन ने बाॅक्सिंग में कांस्य पदक जीतकर देश का गौरव बढाया है। पुरुष हॉकी टीम ने भी टोक्यो ओलिंपिक गेम्स में 41 साल बाद पदक जीता है, बेशक पदक कांस्य हो लेकिन पुरुष हॉकी टीम ने देश का गौरव बढ़ाने का काम किया है, इसके साथ ही देश की बेटियों ने ओलिंपिक गेम्स के सेमीफाइनल में पहुंचकर भविष्य के लिए अपने इरादे जता दिए हैं। टोक्यो ओलिंपिक गेम्स में भारत की दोनों हॉकी टीम्स (महिला और पुरुष) ने भारत का हॉकी में स्वर्णिम इतिहास लाने की भविष्य में आस बढ़ा दी है। कुश्ती में भी पहलवान बजरंग पूनिया ने कांस्य पदक जीतकर देश को गौरवान्वित करने का काम किया है। इसके साथ ही टोक्यो ओलिंपिक गेम्स में भारतीय दल के अन्य खिलाड़ियों ने भी गजब का खेल दिखाया है और उम्मीद जगाई है कि पेरिस ओलिंपिक गेम्स-2024 में पदकों की संख्या और बढ़ेगी। अगर देश के होनहार युवाओं को देश में ही सरकारों या स्वंयसेवी संस्थाओं द्वारा उपयुक्त प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाये तो देश में और प्रतिभायें निखर के आयेंगी और भारत देश का मान विश्व पटल पर होगा।

स्वतंत्रता दिवस प्रसन्नता और गौरव का दिवस है इस दिन सभी भारतीय नागरिकों को मिलकर अपने लोकतंत्र की उपलब्धियों का उत्सव मनाना चाहिए और एक शांतिपूर्ण, सौहार्दपूर्ण एवं प्रगतिशील भारत के निर्माण में स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लेना चाहिए। क्योंकि भारत देश सदियों से अपने त्याग, बलिदान, भक्ति, शिष्टता, शालीनता, उदारता, ईमानदारी, और श्रमशीलता के लिए जाना जाता है। तभी सारी दुनिया ये जानती और मानती है कि भारत भूमि जैसी और कोई भूमि नहीं, आज भारत एक विविध, बहुभाषी, और बहु-जातीय समाज है। जिसका विश्व में एक अहम स्थान है। आज का दिन अपने वीर जवानों को भी नमन करने का दिन है जो कि हर तरह के हालातों में सीमा पर रहकर सभी भारतीय नागरिकों को सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस कराते हैं। साथ-साथ उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को याद करने का भी दिन हैं, जिन्होंने हमारे देश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई।

आज 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भारत के प्रत्येक नागरिक को भारतीय संविधान और गणतंत्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहरानी चाहिए और देश के समक्ष आने वाली चुनौतियों का मिलकर सामूहिक रूप से सामना करने का प्रण लेना चाहिए। साथ-साथ देश में शिक्षा, समानता, सदभाव, पारदर्शिता को बढ़ावा देने का संकल्प लेना चाहिए। जिससे कि देश प्रगति के पथ पर और तेजी से आगे बढ़ सके।

ब्रह्मानंद राजपूत
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Vishal Sharma
Vishal Sharma

Vishal Sharma is a renowned Indian journalist, cyber security expert, social activist, and poet, better known in literary circles as Surur Akbarabadi. Journalism is his first love, through which he has captured the pulse of society and pursued an unwavering commitment to truth. He divides his time between Agra—his ancestral home, famed for the Taj Mahal and Ganga-Jamuni Tehzeeb—and Lucknow, the cultural capital of Uttar Pradesh, where he lives as a devoted husband and doting father. His personal life, filled with love and care for his family, anchors his relentless efforts for societal good. Vishal’s academic path reflects his versatility: a B.Sc. degree sharpened his scientific rigor, while an LL.B. equipped him with a legal perspective. His journalistic career is illustrious, having worked with prominent publications such as The Indian Express, The Pioneer, Indo-American Times, and Business Standard, where he mastered the art of weaving facts into compelling narratives. As Managing Editor of Indian Talent Magazine, he nurtured emerging voices, and today, he runs Agra24.in, a news portal that keeps Agra’s heartbeat alive online, while also serving on the editorial boards of several other digital platforms, amplifying stories that matter. Poetry is Vishal’s close second love, expressed under his pseudonym Surur Akbarabadi—a blend of "joy" and a tribute to Agra’s rich legacy. Inspired by Urdu giants like Ghalib, Faiz, and Nazir Akbarabadi, his verses, such as "विरासत-ए-ज़फ़र का ये अंजाम देखिए" and "खामोशियों का शोर," fuse personal reflection with societal critique, offering both solace and commentary. His prose is equally powerful, spanning environmental concerns, political satire, and calls for unity, resonating widely on platforms like X. Vishal’s dedication to society shines through his diverse roles. As Vice-Chairman of Hindustani Biradari, he champions communal harmony, countering divisive narratives with appeals for peace. As Secretary of the Agra Tourist Welfare Chamber, he strengthens the city’s tourism ecosystem, ensuring its heritage—tangible and intangible—thrives. His work on Agra’s Heritage and History Conservation Committee reflects his commitment to preserving the city’s past, from Mughal marvels to forgotten tales, while his active role in civil society amplifies grassroots concerns. A Cyber Security Consultant by profession, Vishal safeguards digital frontiers, a role that aligns with his critiques of online toxicity. His editorial oversight of Agra24.in and other portals merges his journalism with tech-savvy insight, delivering real-time updates to a global audience. Whether exposing institutional opacity or celebrating cultural milestones, his pen remains a tool for truth. A photography and travel enthusiast, Vishal is fond of long drives across the country, capturing India’s diverse landscapes through his lens. He holds a special love for Rajasthan, where the vibrant culture and rugged beauty inspire him, and often unwinds on jungle safaris, with Sariska being his favorite retreat to reconnect with nature. In Lucknow, he balances his public endeavors with a private life of warmth and stability. A devoted husband and doting father, he draws strength from his family, rooting his activism in personal values. From conserving Agra’s heritage to dissecting global economics, Vishal Sharma stands as a modern polymath—a journalist of conscience, a poet of the people, and a guardian of culture and justice, leaving an indelible mark on India’s intellectual and social fabric.

By Vishal Sharma

Vishal Sharma is a renowned Indian journalist, cyber security expert, social activist, and poet, better known in literary circles as Surur Akbarabadi. Journalism is his first love, through which he has captured the pulse of society and pursued an unwavering commitment to truth. He divides his time between Agra—his ancestral home, famed for the Taj Mahal and Ganga-Jamuni Tehzeeb—and Lucknow, the cultural capital of Uttar Pradesh, where he lives as a devoted husband and doting father. His personal life, filled with love and care for his family, anchors his relentless efforts for societal good. Vishal’s academic path reflects his versatility: a B.Sc. degree sharpened his scientific rigor, while an LL.B. equipped him with a legal perspective. His journalistic career is illustrious, having worked with prominent publications such as The Indian Express, The Pioneer, Indo-American Times, and Business Standard, where he mastered the art of weaving facts into compelling narratives. As Managing Editor of Indian Talent Magazine, he nurtured emerging voices, and today, he runs Agra24.in, a news portal that keeps Agra’s heartbeat alive online, while also serving on the editorial boards of several other digital platforms, amplifying stories that matter. Poetry is Vishal’s close second love, expressed under his pseudonym Surur Akbarabadi—a blend of "joy" and a tribute to Agra’s rich legacy. Inspired by Urdu giants like Ghalib, Faiz, and Nazir Akbarabadi, his verses, such as "विरासत-ए-ज़फ़र का ये अंजाम देखिए" and "खामोशियों का शोर," fuse personal reflection with societal critique, offering both solace and commentary. His prose is equally powerful, spanning environmental concerns, political satire, and calls for unity, resonating widely on platforms like X. Vishal’s dedication to society shines through his diverse roles. As Vice-Chairman of Hindustani Biradari, he champions communal harmony, countering divisive narratives with appeals for peace. As Secretary of the Agra Tourist Welfare Chamber, he strengthens the city’s tourism ecosystem, ensuring its heritage—tangible and intangible—thrives. His work on Agra’s Heritage and History Conservation Committee reflects his commitment to preserving the city’s past, from Mughal marvels to forgotten tales, while his active role in civil society amplifies grassroots concerns. A Cyber Security Consultant by profession, Vishal safeguards digital frontiers, a role that aligns with his critiques of online toxicity. His editorial oversight of Agra24.in and other portals merges his journalism with tech-savvy insight, delivering real-time updates to a global audience. Whether exposing institutional opacity or celebrating cultural milestones, his pen remains a tool for truth. A photography and travel enthusiast, Vishal is fond of long drives across the country, capturing India’s diverse landscapes through his lens. He holds a special love for Rajasthan, where the vibrant culture and rugged beauty inspire him, and often unwinds on jungle safaris, with Sariska being his favorite retreat to reconnect with nature. In Lucknow, he balances his public endeavors with a private life of warmth and stability. A devoted husband and doting father, he draws strength from his family, rooting his activism in personal values. From conserving Agra’s heritage to dissecting global economics, Vishal Sharma stands as a modern polymath—a journalist of conscience, a poet of the people, and a guardian of culture and justice, leaving an indelible mark on India’s intellectual and social fabric.